सीमा पाहवा ने बताया बरसों पहले कैसे होता था काम, कहा- छुपे होते थे कैमरे, चॉक से खींचते थे लाइन

Updated on 16-10-2023 03:28 PM
जानी-मानी वेटरन अदाकारा सीमा पाहवा बड़े पर्दे पर एक के बाद एक शानदार रोल कर रही हैं। पिछले दिनों दिल्ली आईं सीमा ने हमसे खास बातचीत में बताया कि राजधानी उनके दिल के बेहद करीब है और उन्होंने यहां पर रहते हुए काफी सीखा। पेश है इस मुलाकात की खास बातें 

माना जाता है कि उम्र के साथ कलाकारों के प्रति दर्शकों का प्यार कम होने लगता है। लेकिन आपके मामले में उल्टा है कि आपकी उम्र के साथ दर्शकों का प्यार भी बढ़ रहा है। इसका क्या राज है?
इसके लिए तो ऊपर वाले शुक्रिया है। आप लोगों और दर्शकों का भी शुक्रिया। मुझे लगता है कि इससे बढ़कर तो मेरी कोई खुशनसीबी हो ही नहीं सकती है कि मेरी उम्र के साथ मेरे दर्शक बढ़ रहे हैं। बस मुझे इसी तरह दर्शकों का प्यार मिलता रहे। मैं चाहूंगी कि आखिरी दम दर्शकों का प्यार ऐसे ही मिलता रहे।
आपने इंडस्ट्री में काफी लंबा समय बिताया है। पुराने और आज के दौर में आप क्या बदलाव देखती हैं?
ऐसा तो मैं नहीं कहूंगी कि कोई फर्क आ गया है। बस टेक्निकली हम काफी एडवांस हो गए हैं। पहले बहुत सिंपल तरीके से फिल्में बनाई जाती थीं, उतना कुछ तकनीकी तौर पर नहीं था। बहुत लंबे टेक लिए जाते थे, तो ऐक्टर की मेहनत भी काफी होती थी। दरअसल उनके पास रीटेक लेने की ज्यादा गुंजाइश नहीं होती थी। पहले रील होती थी, तो उसमें फुटेज लेना बहुत मुश्किल काम होता था। यह ये प्रोड्यूसर को भी काफी महंगा पड़ता था। इसलिए ऐक्टर्स को भी जल्दी टेक देने की आदत सी हो गई थी। अब डिजिटली इतना एडवांस होने के बाद आप टेक पर टेक लेते जाइए। अब अगर 40 टेक के बाद भी कोई एक टेक ओके हो रहा है, तो भी उसमें किसी का नुकसान नहीं है। इसलिए ऐक्टर्स को अब इसकी आदत हो गई है। आज के ऐक्टर की मेहनत अब पहले वाले ऐक्टर से कम हो गई है, क्योंकि अब वह तकनीक पर निर्भर कर रहा है। वह सोचता है कि मैं कुछ भी करूंगा, तो भी तकनीक के सहारे मेरा रोल निकल ही जाएगा। जबकि पहले ऐक्टर पर काफी दारोमदार होता था। मैंने जब काम करना शुरू किया था, तब लाइव टेलीकास्ट होता था। लाइव टेलीकास्ट का मतलब था कि कैमरे सब जगह छुपे हुए हैं और आपको उन्हें फेस करना है। हमें तब 15 दिन की रिहर्सल, 3 दिन की कैमरा रिहसर्ल में बताया जाता था कि चौक से लाइन खींची है, इस लाइन पर चलकर जाओगे तो क्लोजअप मिलेगा। फलाना लाइन पर चलोगे, तो टू शॉट मिलेगा। उस समय जब ऐक्टर की ट्रेनिंग होती थी, तो उसमें ऐक्टर के पास कोई गुंजाइश नहीं थी कि वह कोई लापरवाही करे।

ऐक्टिंग के अलावा फिल्मों से जुड़ी चीजों में क्या बदलाव देखे आपने?
सिर्फ ऐक्टिंग में ही नहीं सिंगिंग में भी बदलाव हुए हैं। मैं सिंगर नहीं हूं, लेकिन मेरे कान अच्छे हैं। जब मैं किसी नए बच्चे की आवाज सुनती हूं, तो पता चलता है कि यह कच्ची आवाज है। ये ताल से उतरा, ये सुर से भटका, लेकिन तकनीक ने सबको सिंगर बना दिया और सबको सुरीला बना दिया। इसी तरह सब ऐक्टर बन गए। पहले मेरे अंदर ऐसा विचार आता था कि कोई ऐसा कैमरा क्यों नहीं बनता, जो नॉन ऐक्टर के सामने काम ही ना करे। नॉन ऐक्टर सामने आए, तो कैमरा काम ही ना करे। अगर ऐसी कोई तकनीक आ जाए और ईमानदारी पकड़ी जा सके, तो बहुत छंटाई हो सकती है। जो लोग ये मान चुके हैं कि वे सब जानते हैं, तो उन्हें भी सीखने का मौका मिले। मुझसे अगर आज कोई कहने आता है कि मेरा ऐक्टिंग करने का मन है, तो मैं उसे कहती हूं कि मेरा भी मन कर रहा है कि मैं किसी के हार्ट का ऑपरेशन करूं, तो वो कहते हैं ऐसे कैसे? तो मैं उन्हें समझाती हूं कि जब हम अचानक उठकर हार्ट का ऑपरेशन नहीं कर सकते, अचानक बिल्डिंग नहीं बना सकते, तो आप अचानक ऐक्टिंग कैसे कर सकते हैं। आपने ऐक्टिंग को तमाशा समझ लिया है। ग्लैमर की वजह से लोग इसमें आना चाहते हैं। मुझे लगता है कि तकनीक आने के बाद मेहनत बढ़ जानी चाहिए थी, लेकिन वह अब कम होती जा रही है। इसका नुकसान हमारी इंडस्ट्री को हो रहा है।

पिछले दिनों आप पहली बार फिल्म यात्रीज में रघुवीर यादव के साथ दिखीं। उनके साथ काम करना कैसा एक्सपीरियंस था?
अनुभव काफी अच्छा था। रघुवीर जी के बारे में क्या बोलें, उनके बारे में तो सब जानते हैं कि वह कमाल के ऐक्टर और कलाकार हैं। मैं उनकी काफी बड़ी फैन रही हूं। हमेशा से चाहत थी कि उनके साथ काम करने का मौका मिले, लेकिन कभी ऐसा हुआ नहीं। इसलिए जब मुझे पता चला कि इस फिल्म में रघुवीर जी हैं, तो मेरे लिए बड़ा अट्रैक्शन था कि उनके साथ काम करने का मौका मिलेगा। शूटिंग के दौरान भी आप एक- दूसरे से अनुभव साझा करते हैं। इस सबसे बहुत कुछ सुनने और सीखने को मिलता है।

आपकी फिल्म ट्रैवल के बारे में थी। आपके फेवरेट डेस्टिनेशन कौन से हैं?

मुझे पहाड़ी इलाके काफी पसंद हैं। पता नहीं हम लोगों को पहाड़ों से इतना प्यार क्यों होता है। शायद हमारा प्रकृति से जुड़ना जरूरी होता है। हमारा काम ही ऐसा है। मेरी फेवरिट जगह ऋषिकेश है। बहुत से डायरेक्टर और प्रड्यूसर्स जानते हैं कि मुझे अगर ऋषिकेश शूटिंग की बात कही जाएगी, तो मैं ना नहीं करूंगी। मैंने आयुष्मान और भूमि के साथ बैक टु बैक तीन फिल्में कीं, और वे तीनों फिल्में ऋषिकेश से जुड़ी हुई थीं।

दिल्ली में आपने अपनी जिंदगी का काफी वक्त बिताया है। यहां आपको सबसे ज्यादा क्या पसंद है?
दिल्ली की सबसे खूबसूरत चीज ये है कि यहां का खाना बेहद लाजवाब होता है। दिल्ली में जैसा खाना मिलता है, मुझे नहीं लगता कि कहीं और मिलता होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि दिल्ली में देश का हर स्वाद मिलता है। मैं यहीं पर पली-बढ़ी हूं। मेरा आधा जीवन भी यहीं गुजरा है। मेरी शादी से लेकर बच्चे तक यहीं हुए हैं। दिल्ली मेरे लिए हमेशा खास रहेगा। अगर अपनी फील्ड की बात करूं, तो मुझे लगता है कि कल्चरली जितना संपन्न दिल्ली है, उतने संपन्न बहुत कम शहर हैं। यहां हर तरह का आर्ट फॉर्म, आर्ट इंस्टीट्यूट और छात्र हैं। यहां मंडी हाउस में देखो, तो एक तरफ भरतनाट्यम हो रहा है, दूसरी तरफ कत्थक है। वहां म्यूजिक की आवाज आती रहती है, तो हम पेटिंग भी देखने जाते थे। काफी पहले तो मंजर थियेटर प्रगति मैदान में हमने 5 रुपये में इंटरनैशनल सिनेमा भी देखा है। मैं मानती हूं कि यह अनुभव मेरे लिए धरोहर की तरह है। जो कुछ मैंने दिल्ली में सीखा, वो मैं कहीं और नहीं सीख सकती थी।


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