ग्रीनलैंड के दुर्लभ खजाने को गटक जाएंगे सुपरपावर्स, समुद्री रास्तों पर कब्जा, US, चीन और रूस के 'ग्रेट गेम' को जानें

Updated on 16-01-2026 12:40 PM
वॉशिंगटन/मॉस्को: ग्लोबल वार्मिंग ने आर्कटिक के बर्फ को पिघलाना क्या शुरू किया, ग्रीनलैंड को लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने नया जियो पॉलिटिकल आग लगा दी है। ग्रीनलैंड, दुनिया में जंग का नया अखाड़ा बन गया है। ट्रंप हर हाल में ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाना चाहते हैं, चाहे इसके लिए उन्हें यूरोप से जंग ही क्यों न लड़ना पड़े। जलवायु परिवर्तन ने ग्रीनलैंड में बर्फ की चादर को पिघलाना शुरू कर दिया है, जिससे आर्कटिक सागर में नये शिपिंग लेन बनने की संभावनाएं हैं। नये समुद्री रास्ते खुल रहे हैं और कीमती खनिज, जो सदियों से अथाह बर्फ में छिपे थे, वो अब सामने आने लगे हैं। ग्रीनलैंड में संभावित जंग का रास्ता यहीं से खुलता है। ग्रीनलैंड में पांच साल पहले यूरोपिय यूनियन के नक्शे के बराबर, यानि 4.6 मिलियन वर्ग किलोमीटर में बर्फ का चादर फैला हुआ था। जबकि 1981 से 2010 के बीच 6.4 मिलियन वर्ग किलोमीटर में बर्फ था, यानि 27 प्रतिशत बर्फ पिघल गया है, जो लीबिया के क्षेत्रफल के बराबर है।

ग्रीनलैंड में बर्फ पिघलने का असर ये हुआ है कि बर्फ की चादर अब रूस और कनाडा के तटों तक नहीं पहुंच रही हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उत्तरी ध्रुव के नीचे कोई जमीन नहीं है। इसीलिए समुद्र का विस्तार हो रहा है। जैसे-जैसे आर्कटिक सागर ज्यादा समय के लिए जहाजों के लिए रास्ते बना रहे हैं, वैसे वैसे कॉमर्शियल शिपिंल लेन बनने लगे हैं। सबसे ज्यादा समुद्री रास्ता उत्तरी समुद्री रास्ता है, जो उत्तर-पूर्वी रास्ते से मिलता है और यूरोप से एशिया तक रूस के आर्कटिक तट के साथ-साथ चलता है। इसीलिए रूस की इसपर काफी ज्यादा नजर है। रूस के लिए ये रास्ता काफी महत्वपूर्ण बन जाता है। इसके अलावा, पश्चिम में, उत्तर-पश्चिमी रास्ता कनाडा के आर्कटिक द्वीपसमूह से होकर गुजरता है, जबकि उत्तरी ध्रुव के पार एक केंद्रीय आर्कटिक रास्ता भी शायद कुछ सालों में बर्फ के पिघलने से बन जाएगा।
ग्रीनलैंड नये सिरे से खींच रहा दुनिया में शिपिंग का नया नक्शा
आर्कटिक में बर्फ पिघलने से ग्लोबल ट्रेड मैप फिर से बन रहा है और ऐसे रास्ते जोड़ रहा है जो स्वेज नहर का विकल्प दे सकते हैं। इससे पश्चिमी यूरोप से पूर्वी एशिया तक की यात्रा को करीब करीब आधा हो सकता है। 2025 में कंटेनर शिप इस्तांबुल ब्रिज उत्तरी समुद्री रास्ते से चीन से यूरोप तक यात्रा करने वाला पहला लाइनर जहाज बन गया था, जिसे "पोलर सिल्क रोड" शॉर्टकट के नाम से भी जाना जाता है। यह जहाज, चीन के निंगबो से यूनाइटेड किंगडम के फेलिक्सस्टो तक सिर्फ 20 दिनों में पहुंच गया। वहीं, समुद्री निगरानी संगठन मरीन एक्सचेंज ऑफ अलास्का के डेटा से जो जानकारी मिलती है, वो और चौंकाने वाला है। पता चला है कि 2024 में बेरिंग स्ट्रेट से 665 जहाज गुज़रे, जो रूस को अमेरिका से अलग करता है। यह 2010 के 242 जहाजों की तुलना में 175% ज्यादा है।
नॉर्वे के फ्रिड्टजॉफ नानसेन इंस्टीट्यूट की रिसर्चर सेराफिमा एंड्रीवा ने द गार्जियन की रिपोर्ट में कहा है कि "मॉस्को यूरोप से एशिया तक नॉर्थ-ईस्ट पैसेज का "पूरे साल" इस्तेमाल करने का लक्ष्य बना रहा है और न्यूक्लियर आइसब्रेकर में भारी निवेश कर रहा है।" दूसरी तरफ कई आर्कटिक देशों का आर्कटिक पर दावा रहा है, जिनमें कनाडा, डेनमार्क, नॉर्वे, रूस और अमेरिका शामिल हैं। अमेरिका की पहले से ही आर्कटिक और खासकर ग्रीनलैंड में मिलिट्री मौजूदगी है। ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिम में दूर स्थित पिटुफिक बेस, अमेरिका और नाटो के लिए मिसाइल चेतावनी, मिसाइल डिफेंस और स्पेस ऑपरेशन का काम करता है।
ग्रीनलैंड पर अमेरिका बनाम रूस का 'बर्फीला युद्ध'
रूस ने पिछले एक दशक में आर्कटिक में प्रेशर बनाने के लिए कई मिलिट्री बेस खोले हैं। इसके अलावा मॉस्को ने पुराने सोवियत इंफ्रास्ट्रक्चर और एयरफील्ड्स को भी फिर से एक्टिव कर दिया है। वहीं, चीन ने भी 2016 में खुद को आर्कटिक का 'करीबी देश' घोषित कर दिया था। इसीलिए संघर्ष भी बढ़ना शुरू हो गया। नाटो देश आर्कटिक में अपनी नौसैनिक मौजूदगी को लगातार बढ़ा रहे हैं। इन देशों ने भी बर्फ को काटना और नये शिपिंग लेन बनाने शुरू कर दिए हैं। नाटो का विस्तार अब नॉर्डिक तक हो चुका है। जिससे डेनमार्क की वायु सेना फिनलैंड, नॉर्वे और स्वीडन के साथ ज्यादा इंटीग्रेटेड हो गई है। 2024 में, चीन ने आर्कटिक में तीन आइसब्रेकिंग जहाज तैनात किए थे।

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