नरसिंहगढ़ के चीतल मिटाएंगे कूनो के चीतों की भूख

Updated on 09-09-2022 05:31 PM

चीतों की भूख मिटाने के लिए अभयारण्य में नरसिंहगढ़ के चीतल बड़ी संख्या में छोड़े जाएंगे। इनके अलावा अभयारण्य में पाए जाने वाले कुत्ते एवं अन्य शाकाहारी जानवर भी चीतों का भोजन होंगे। इन्हें खाकर चीते रोगग्रस्त न हों इसके लिए सभी जानवरों का रोग प्रतिरोधक टीका भी लगाया जा रहा है।

अधिकारिक सूत्रों के अनुसार, चीतों का कूनो में बसाने के लिए पार्क प्रबंधन का जोर अनुकूलन पर है। चीते क्या खाएंगे,कहां रहेंगे इन सभी बातों का पूरा ध्यान रखा जा रहा है। इन्हें एक माह तक क्वारेंटाइन रखा जाएगा। इस अवधि में चीतों के बाड़ों में कम उम्र के चीतल छोड़े जाएंगे, ताकि वे उन्हें मारकर खा सकें। इसके लिए राजगढ़ जिले के नरसिंहगढ़ से चीतल कूनो पहुंचाने का सिलसिला शुरू हो गया है। शिकार के लिए चीतल चुने जाने की एक वजह यह भी कि चीतल शाकाहारी प्राणी है।

अफ्रीका में चीतल नहीं पाए जाते लेकिन वहां चीते इनके जैसे ही दूसरे शाकाहारी प्राणियों का शिकार कर अपनी भूख मिटाते हैं। कूनों में चीतल की मौजूदगी से नए प्राणियों को लेकर उनका डर भी खत्म होगा। चीता परियोजना के अध्ययन में यह बात आ चुकी है और विशेषज्ञ यह भी बता चुके हैं कि वह चीतल को भी मारने में सक्षम है।

चीतों का तीन माह तक व्यवहार देखा जाएगा। यदि सब कुछ ठीक रहा, तो तीन माह बाद एक नर चीता को खुले जंगल में छोड़ा जाएगा। उसे रेडियो कालर लगाई जाएगी और लगातार निगरानी की जाएगी। करीब चार माह की सफ लता के बाद एक मादा चीता को छोड़ा जाएगा। कूनो में चीतों के पुनर्वास के लिए दो अलग-अलग बाड़े तैयार किए गए हैं। इनमें एक में नर व दूसरे में मादा चीते रहेंगे। बताया जाता है कि नामीबिया में भी विस्थापित किए जाने से पूर्व आठों चीतों का टीकाकरण कर इन्हें एक माह क्वारेंटाइन रखा गया है। यह अवधि पूरी हो चुकी है। इसके बाद ही चीतों को भारत को सौंपा जा रहा है।


नामीबिया से विशेष मालवाहक विमान से आठ चीते आगामी 16 सितंबर को ग्वालियर या जयपुर पहुंचेंगे। यहां से इन्हें हैलीकॉप्टर द्वारा कूनो लाया जाएगा। इसके लिए कूनो के विशेष बाड़ों में दो हैलीपैड बनाए गए हैं। चीतों को पिंजरों में बेहोश कर प्रवेश कराया जाएगा, लेकिन इन्हें ज्यादा समय तक बेहोश नहीं रखा जा सकता, इसे ध्यान में रखते हुए पिंजरों में प्रकाश व हवा की विशेष व्यवस्था रहेगी।

पिंजरों का गेट रिमोट से संचालित होगा और प्रधानमंत्री मोदी (Prime Minister Narendra Modi) द्वार Cheetah Project का उद्घाटन किया जायेगा। वे रिमोट दबाकर ही चीतों को कूनो में छोड़ेंगे। चीता को छोडऩे के लिए बाड़े में अलग गेट रहेगा। जिससे सटाकर ही पिंजरों को रखा जाएगा। चीतों को अभयारण्य में छोड़े जाने के कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले दो नर चीतों को पहले बाड़े में और इसके बाद एक मादा चीतों को दूसरे बाड़े में छोडऩे की औपचारिकता पूरी करेंगे। इसके बाद शेष चीतों को भी इसी तरह अलग-अलग बाड़ों में छोड़ा जाएगा।

दक्षिण अफ्रीका व नामीबिया से चीता लाने का सिलसिला पांच साल तक चलेगा। पहली खेप में नामीबिया से आठ चीते लाए जा रहे हैं। इसके बाद दक्षिण अफ्र ीका से 12 और चीते लाए जाने की योजना है। बताया जाता है कि यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा ताकि भारत में इनकी आबादी बढ़ाई जा सके। कूनो पार्क में चीतों की वंशवृद्धि होने के बाद इन्हें सागर के नौरादेही अभयारण्य और इसके बाद मंदसौर के गांधीसागर अभयारण्य में बसाया जाएगा। इसके लिए दोनों ही अभयारण्यों की कार्ययोजना भी बनाई जा रही है।

ज्ञात हो कि चीतों के पुनर्वास के लिए देश के 10 व मप्र के दो अभयारण्यों का सर्वेक्षण किया गया था। इनमें सागर का नौरादेही भी शमिल है,लेकिन कूनो को अधिक उपयुक्त माना गया। कूनो के राष्ट्रीय उद्यान के 750 वर्ग किलोमीटर में लगभग दो दर्जन चीतों के रहवास के लिए उपयुक्तता है। इसके अतिरिक्त करीब 3 हजार वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र के दो जिले श्योपुर और शिवपुरी में चीतों के स्वंच्छद वितरण के लिए उपयुक्त हैं।


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