अजमेर सेक्स स्कैंडल का आखिरी आरोपी अब भी फरार:पकड़ा गया तो सजा दिलाने में कई साल लगेंगे

Updated on 22-08-2024 01:18 PM

देश के सबसे बड़े सेक्स स्कैंडल (अजमेर ब्लैकमेल कांड) में 20 अगस्त को 6 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। इस मामले में 18 आरोपी थे। 16 को सजा सुनाई जा चुकी है। एक ने सुसाइड कर लिया।

केस में एक आरोपी अलमास महाराज अब भी गिरफ्तार नहीं हुआ है। वह फरार है। उसके खिलाफ पीड़ितों के साथ अश्लील फोटो-वीडियो के सबूत हैं। पुलिस 32 साल से उसे ढूंढ रही है। विदेश भागने के संदेह के कारण इंटरपोल ने उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी कर दिया।

कौन था अलमास महाराज
अजमेर का मूल निवासी अलमास महाराज उस समय अमेरिका में नौकरी करता था। उसका सबसे नजदीकी दोस्त नफीस चिश्ती था। चिश्ती उस समय यूथ कांग्रेस का वाइस प्रेसिडेंट था। अब अलमास महाराज की उम्र करीब 55 से 60 साल होगी। अगर अलमास महाराज पुलिस के सामने भी आ जाए तो पहचाना मुश्किल होगा। पहचान पत्र की जांच या DNA जांच के बिना उसकी पहचान मुश्किल है।

पीड़ितों का शोषण करने अमेरिका से आते थे
मामले में पहली शिकायत 30 मई 1992 को दर्ज हुई थी। पीड़ितों का शोषण 1992 से कई साल पहले ही शुरू हो गया था। उस दौरान सैयद जमीर हुसैन और अलमास महाराज अमेरिका में रहते थे। जमीर के पास अमेरिका की नागरिकता थी। दोनों ही उस दौरान कई बार अमेरिका से अजमेर आए। इस दौरान दोनों ने गैंग के साथ मिलकर पीड़ितों का शोषण किया था।

पीड़ितों के साथ अश्लील डांस का वीडियो
सहायक निदेशक अभियोजन विभाग वीरेंद्र सिंह राठौड़ ने बताया कि अलमास महाराज ने नफीस चिश्ती के साथ मिलकर कई पीड़ितों का आरोपियों के फार्महाउस पर शोषण किया था। इस दौरान पीड़ितों को ब्लैकमेल करने के लिए नफीस और अलमास ने उनके अश्लील फोटो और वीडियो बनाए थे। उनके पीड़ितों के साथ अश्लील डांस के वीडियो थे। उन्हें नहीं पता था कि ये वीडियो उनके खिलाफ सबसे बड़ा सबूत बन जाएंगे। केस में जब पुलिस उसके साथियों को गिरफ्तार करने लगी तो अलमास डर गया। उसे लगा कि पुलिस उसे पकड़ लेगी। इसी डर से वह फरार हो गया।

पुलिस ने भगोड़ा घोषित किया, इंटरपोल से रेड कॉर्नर नोटिस
अलमास महाराज अमेरिका में नौकरी करता था। आशंका जताई जा रही है कि वह पुलिस से बचने के लिए विदेश भाग गया। फरार होने के बाद पुलिस ने कई साल तक उसकी तलाश की। उसका कोई सुराग हाथ नहीं लगा। इसके बाद पुलिस ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया। पुलिस ने उसके खिलाफ इंटरपोल से रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी कराया। रेड कॉर्नर नोटिस उनके खिलाफ जारी होता है, जिनके विदेश में फरार होने की आशंका होती है।

पकड़ा भी गया तो सजा दिलाना आसान नहीं
सहायक निदेशक अभियोजन विभाग वीरेंद्र सिंह राठौड़ ने बताया कि केस में सिर्फ अलमास महाराज को पकड़ना बाकी है। अब अगर पुलिस उसे पकड़ भी लेती है तो सजा दिलाना आसान नहीं होगा। गिरफ्तारी के बाद पुलिस उसके खिलाफ चार्जशीट पेश करेगी। कोर्ट में फिर से ट्रायल चलेगा। सभी पीड़ितों और गवाहों को फिर से उसके खिलाफ कोर्ट में बयान देने होंगे।

पहले 8 दोषियों को सजा दिलाने में 6 साल लग गए
केस में 30 मई 1992 को पहली एफआईआर दर्ज हुई। इसके बाद केस में कुल 18 आरोपी बनाए गए। इनमें से 8 आरोपियों कैलाश सोनी, हरीश तोलानी, इशरत अली, मोइजुल्लाह उर्फ पुत्तन इलाहाबादी, परवेज अंसारी, महेश लुधानी, अनवर चिश्ती और शम्सू उर्फ माराडोना के खिलाफ ट्रायल चला।

लंबे ट्रायल के बाद पहला जजमेंट 18 मई 1998 को आया। तत्कालीन जिला जज कन्हैयालाल व्यास ने इन आठों को दोषी माना और उम्रकैद की सजा सुनाई।

केस लम्बा चलाने के लिए आरोपियों ने एक-एक करके सरेंडर किया
1998 में 8 दोषियों को उम्रकैद की सजा होने के बाद केस में पांच साल बाद फिर से कार्रवाई शुरू हुई। साल 2003 तक इस केस के 7 आरोपी नफीस चिश्ती (तत्कालीन यूथ कांग्रेस वाइस प्रेसिडेंट), अनवर चिश्ती (तत्कालीन यूथ कांग्रेस जॉइंट सेक्रेटरी), इकबाल भाटी, सलीम चिश्ती, सोहैल गनी, जमीर हुसैन, अलमास महाराज और नसीम उर्फ टारजन मामले में फरार चल रहे थे।

आरोपियों को अच्छे से पता था कि हर आरोपी की गिरफ्तारी के बाद पुलिस नई चार्जशीट पेश करेगी और कोर्ट में अलग से ट्रायल चलेगा। इसे ध्यान में रखते हुए नफीस चिश्ती, अनवर चिश्ती, इकबाल भाटी, सलीम चिश्ती, सोहैल गनी, जमीर हुसैन और नसीम उर्फ टारजन ने लंबे अंतराल के बाद पुलिस के सामने सरेंडर किया।

हर बार नई चार्जशीट के कारण सजा दिलाने में ज्यादा वक्त लगा
पुलिस ने सभी चार्जशीट 173 CrPC के तहत पेश की थीं। इसके चलते केस में हर बार आरोपी की गिरफ्तारी के बाद नई चार्जशीट पेश करनी थी। साल 2003 में नफीस चिश्ती और नसीम उर्फ टारजन को अलग-अलग प्रयागराज (तब इलाहाबाद) और दिल्ली के धौला कुआं इलाके से पकड़ा गया। 2004 में दोनों आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट पेश होने के बाद कोर्ट में ट्रायल शुरू हुआ।

2005 तक मामले में 52 गवाहों के बयान भी हो गए थे। तभी इसी मामले में एक और आरोपी इकबाल भाटी को मुंबई से गिरफ्तार कर लिया गया। इस गिरफ्तारी के बाद नफीस चिश्ती और नसीम का ट्रायल रोक दिया गया।

इकबाल भाटी की गिरफ्तारी के बाद कोर्ट में एक और चार्जशीट पेश की गई। अब नफीस चिश्ती, नसीम और इकबाल भाटी के खिलाफ नए सिरे से ट्रायल शुरू किया गया।

साल 2012 में आरोपी सलीम चिश्ती भी पुलिस के हत्थे चढ़ गया। इसके बाद सलीम चिश्ती और जमीर हुसैन के खिलाफ नई चार्जशीट पेश की गई। इसके बाद नफीस चिश्ती, नसीम, इकबाल भाटी, सलीम चिश्ती और जमीर हुसैन के खिलाफ नए सिरे से ट्रायल स्टार्ट हुआ। साल 2018 में एक और आरोपी सोहैल गनी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। एक बार फिर ट्रायल रोक दिया गया। मामले की एक और नई चार्जशीट पेश हुई और फिर से ट्रायल शुरू हुआ।

आखिरकार 20 साल तक चले ट्रायल के बाद 20 अगस्त को कोर्ट ने नफीस चिश्ती (54), नसीम उर्फ टार्जन (55), सलीम चिश्ती (55), इकबाल भाटी (52), सोहिल गनी (53), सैयद जमीर हुसैन (60) को उम्रकैद की सजा सुनाई। उन पर 5-5 लाख का जुर्माना भी लगाया है।



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