एम्स भोपाल में बनेगा प्रदेश का सबसे बड़ा हर्बल गार्डन:एम्स निदेशक बोले- पतंजलि की मदद से मध्य प्रदेश की 'रिच ट्राइबल मेडिसिन' ढूंढ़कर निकालेंगे

Updated on 04-06-2025 12:40 PM

अब भोपाल के एम्स अस्पताल में सिर्फ एलोपैथी का इलाज ही नहीं, बल्कि हमारी पुरानी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का खजाना भी मिलेगा। एम्स भोपाल और बाबा रामदेव की पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन मिलकर प्रदेश का सबसे बड़ा हर्बल गार्डन बनाने जा रहे हैं। यह सिर्फ पेड़-पौधे लगाने तक सीमित नहीं होगा, बल्कि यह इलाज के नए और सस्ते तरीके ढूंढने में भी मदद करेगा।

एम्स के निदेशक डॉ. अजय सिंह ने बताया कि यह हर्बल गार्डन कोई साधारण बगीचा नहीं होगा। इसमें सिर्फ मध्य प्रदेश के ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों और पूरे देश में मिलने वाले उन खास औषधीय पौधों को लगाया जाएगा जो शायद आपने पहले कभी न देखे हों। एम्स का मानना है कि इन पौधों में कई बीमारियों को ठीक करने की ताकत है, जिनके बारे में हम भूलते जा रहे हैं।

मध्य प्रदेश की 'रिच ट्राइबल मेडिसिन' ढूंढ़कर निकालेंगे डॉ. सिंह के अनुसार प्रदेश में कई ऐसे इलाके हैं जहां बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय रहते हैं। ये समुदाय सदियों से जंगलों और प्रकृति के करीब रहे हैं। इन समुदायों के पास पेड़-पौधों, जड़ों, पत्तियों और छालों से बीमारियों का इलाज करने का बहुत पुराना और गहरा ज्ञान होता है। यह ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से चलता रहता है। इसे 'समृद्ध' इसलिए कहा गया है क्योंकि इस ज्ञान में कई ऐसी जड़ी-बूटियां और उनके इस्तेमाल के तरीके शामिल हैं जिनके बारे में आधुनिक विज्ञान अभी भी पूरी तरह नहीं जानता।

एम्स और पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन की टीमें ऐसे ट्राइबल वैद्य, हकीम या बुजुर्गों से मिलेंगे, जो इस पारंपरिक ज्ञान को जानते हैं। उनकी मदद से पौधों की पहचान करेंगे। जो जड़ी-बूटियां खोजी जाएंगी, उन पर एम्स में वैज्ञानिक रिसर्च की जाएगी। इससे पता चलेगा कि वे कितनी असरदार हैं, उनमें कौन से रासायनिक तत्व हैं। अगर ये पारंपरिक औषधियां वैज्ञानिक रूप से प्रभावी साबित होती हैं, तो उनसे नई, सस्ती और असरदार दवाएं बनाई जा सकेंगी। इससे आम लोगों को कम खर्च में बेहतर इलाज मिल पाएगा।

तीन चरणों में बनेगा यह गार्डन:

  • पहला चरण: आसानी से उगने वाले पौधे: शुरुआत में उन औषधीय पौधों को लगाया जाएगा जिन्हें उगाने के लिए किसी खास इंतजाम (जैसे एसी या खास मिट्टी) की जरूरत नहीं होती। ये पौधे भोपाल के मौसम में आसानी से उग सकेंगे।
  • दूसरा चरण: मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों की खोज: यह चरण सबसे ज्यादा दिलचस्प होगा। एम्स की टीम मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों में जाएगी, जहां आज भी लोग इलाज के लिए अपनी पुरानी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करते हैं। इन छुपी हुई औषधियों को तलाशा जाएगा, उनकी पहचान की जाएगी और फिर उन्हें एम्स के हर्बल गार्डन में लगाया जाएगा ताकि उन पर रिसर्च की जा सके। यह हमारी अपनी पारंपरिक दवाओं को दोबारा सामने लाने का एक बड़ा प्रयास होगा।
  • तीसरा चरण: पहाड़ और देश-विदेश के खास पौधे: आखिरी चरण में उत्तराखंड में मिलने वाले कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण औषधीय पौधों को लगाया जाएगा। इसके साथ ही, देश भर से कुछ 'एग्जॉटिक' यानी दुर्लभ और खास जड़ी-बूटियों को भी लाया जाएगा। चूंकि इन पौधों को भोपाल के मौसम में जिंदा रखना मुश्किल हो सकता है, इसलिए इन्हें खास 'आर्टिफिशियल सेटअप' (नकली वातावरण) में रखा जाएगा। जिससे वो बिना समस्या के पनप सकें।

पुराने ज्ञान को नए विज्ञान से जोड़ना इस पूरे प्रोजेक्ट का मकसद सिर्फ एक सुंदर बगीचा बनाना नहीं है। यह न्यू एजुकेशन पॉलिसी 2020 के तहत भी आता है, जिसमें कहा गया है कि मेडिकल की पढ़ाई में हर तरह के इलाज (जैसे एलोपैथी, आयुर्वेद, होम्योपैथी) को जोड़कर देखा जाना चाहिए। यानी, मरीजों को सिर्फ एक तरह का इलाज नहीं, बल्कि सबसे बेहतर, सस्ता और असरदार इलाज मिले। चाहे वह किसी भी चिकित्सा पद्धति से क्यों न हो। इसे मॉडर्न साइंस में 'इंटिग्रेटेड मेडिसिन' नाम दिया गया है।

इलाज के साथ-साथ अब होगी रिसर्च भी यह हर्बल गार्डन बनने से दो बड़े फायदे होंगे। पहला, अस्पताल में ही आयुष विभाग के मरीजों के इलाज के लिए औषधीय जड़ी-बूटियां उपलब्ध हो सकेंगी। दूसरा, एम्स में मेडिकल के छात्र इन पौधों पर गहराई से रिसर्च कर सकेंगे। डॉ. सिंह ने बताया कि अभी तक छात्र सिर्फ किताबों में ही इन पौधों के बारे में पढ़ते थे, लेकिन अब वे इन्हें अपनी आंखों से देख सकेंगे, छू सकेंगे और इनके गुणों को समझ सकेंगे। इनपर जांच भी कर सकेंगे।



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