तालिबान को लेकर क्या है भारत की विदेश नीति, अफगानिस्तान पर मोदी सरकार की चुप्पी क्या कहती है?

Updated on 01-12-2023 01:16 PM
काबुल: भारत और अफगानिस्तान के बीच दशकों से जारी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध 23 नवंबर 2023 को टूट गए। इसी दिन अफगानिस्तान के दूतावास ने भारत में अपने काम को बंद करने का ऐलान कर दिया। इस दूतावास को अफगानिस्तान की पिछली सरकार में नियुक्त अफगान कर्मचारी चला रहे थे। दिल्ली में स्थित अफगान दूतावास जो कभी भारत के गणमान्य व्यक्तियों और राजनीतिक वर्ग के शीर्षस्थों की मेजबानी करता था, अब उजाड़ नजर आने लगा है। इस दूतावास की दीवारों पर अब भी पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी की आदमकद छवियां मौजूद हैं, जो दो साल पुरानी कहानी को बयां करती हैं। वहीं, मौजूदा कब्जाधारी तालिबान हुकूमत का कहना है कि वह जल्द ही नई दिल्ली में अफगान दूतावास को शुरू कर देगा। लेकिन, अभी तक भारत की अफगानिस्तान को लेकर विदेश नीति स्पष्ट नहीं हो सकी है।

अफगान दूतावास की बंदी ने भारत की नीति पर उठाए सवाल

अगस्त 2021 में जब तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया, तभी से नई दिल्ली में मौजूद अफगान दूतावास के भविष्य पर सवाल उठने शुरू हो गए थे। हालांकि, दो साल तक यह दूतावास जैसे-तैसे चलता रहा। इस दूतावास ने वीजा संबंधी काम भी किए, लेकिन पहले की तुलना में काफी कम। तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता संभालते ही अपने पसंदीदा अधिकारियों की नियुक्ति शुरू कर दी, जिसका पूर्व अफगान अधिकारियों ने विरोध किया। नई दिल्ली में अफगान दूतावास जिस तरह से बंद हुआ, उसने भारत सरकार के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जो हमेशा देश के बावजूद अफगानिस्तान का मित्र होने पर गर्व करता है। इस बार हालात इसलिए ज्यादा बिगड़ गए क्योंकि पूर्व अफगान लोकतांत्रिक सरकार के राजनयिक कर्मचारियों ने भारत पर तालिबान द्वारा नियुक्त और संबद्ध राजनयिकों के साथ सहयोग करने का आरोप लगाया है। भारत ने इस मामले पर चुप्पी साध रखी है।

भारत और अफगानिस्तान में दोस्ती का इतिहास


1950 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और भारत में अफगानिस्तान के राजदूत नदजीबुल्लाह के बीच मित्रता की संधि की स्थापना से लेकर 2011 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई के बीच रणनीतिक साझेदारी के समझौते पर हस्ताक्षर करने तक, नई दिल्ली और काबुल के बीच द्विपक्षीय संबंधों को लगातार उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा। पाकिस्तान की कुटिल चाल के बावजूद भारत और अफगानिस्तान ने दशकों से मजबूत पड़ोसी संबंध बनाए रखे हैं। अगस्त 2021 तक, भारत अफगान छात्रों और राजनेताओं के लिए सबसे पसंदीदा स्थान था, जो देश को न केवल लोकतंत्र के प्रतीक के रूप में देखते थे बल्कि एक ऐसे देश के रूप में भी देखते थे जहां अफगानों का खुले दिल से स्वागत किया जाता था। रबींद्रनाथ टैगोर की प्रसिद्ध कहानी काबुलीवाला कहने को तो काल्पनिक रचना है, लेकिन यह दर्शाती है कि प्राचीन काल से भारतीय और अफगान कितने करीब रहे हैं।

दो साल में कैसे बदले भारत-अफगानिस्तान संबंध


भारत और अफगानिस्तान की इस पुरानी दोस्ती में आज सब कुछ बदल चुका है। अगस्त 2021 के बाद से अफगान शरणार्थियों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है, जब भारत ने अचानक अपनी वीजा नीति में बदलाव किया और सभी वैध वीजा रद्द कर दिए। इससे हजारों अफगान छात्रों को भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति नहीं मिली। इतना ही नहीं, देश भर में शरणार्थी के रूप में रहने वाले अफगानी और जिन्होंने अपने देश में लगातार युद्ध के कारण भारत को अपना घर बनाया, उन्हें भी देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है। कई वर्षों तक भारत में सेवा कर चुके और अब अमेरिका में रह रहे एक पूर्व अफगान राजनयिक के अनुसार, अफगानों ने कभी भी भारत से इतना अलग-थलग महसूस नहीं किया। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक रूप से अफगानों ने पाकिस्तान और अन्य देशों में शरण मांगी है, लेकिन भारत उनका सपना था जहां पता था कि उन्हें शांति मिलेगी।

भारत की वर्तमान अफगानिस्तान नीति वास्तव में क्या है?


भारत ने हमेशा लोकतांत्रित अफगानिस्तान और तालिबान का विरोध करने वाली ताकतों का समर्थन किया है। भारत-अफगानिस्तान संबंधों के इतिहास में यह पहली बार है कि नई दिल्ली काबुल में तालिबान शासन के साथ बात करती नजर आ रही है। जब अगस्त 2021 में तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया, तब भारत ने अफगानिस्तान से किनारा कर लिया। भारत अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी की ओर उम्मीदों से देख रहा था, लेकिन वो खुद शरण लेने के लिए काबुल छोड़कर विदेश फरार हो गए। भारत ने फिर भी काफी इंतजार किया। इसका पता इस बात से लग सकता है कि अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास बंद होने वाले अंतिम दूतावासों में से एक था, जिसमें राजनयिक कर्मचारियों को केवल आवश्यक चीजों के साथ स्वदेश वापस आने का निर्देश दिया गया था।

तालिबान से संपर्क बढ़ा रहा है भारत

भारत ने जून 2022 में काबुल में अपना दूतावास फिर से खोला, लेकिन मानवीय सहायता प्रदान करने के अलावा, रिश्ते को आगे बढ़ाने के लिए कुछ भी नहीं किया है। इसके विपरीत, संबंध और खराब ही हुए हैं। यहां तक कि कुछ बड़ी बुनियादी ढांचा विकास परियोजनाएं, जो अमेरिका के 20 साल लंबे युद्ध के बाद अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए थीं, अभी भी रुकी हुई हैं, जबकि भारतीय करदाताओं का पैसा वहां फंसा हुआ है। यह वही भारत है जिसने पिछली बार 27 सितंबर, 1996 से 16 नवंबर, 2001 तक जब अफगानिस्तान में तालिबान सत्ता में था, तब उसके साथ संबंध तोड़ दिए थे। भारत ने अफगानिस्तान के साथ हमेशा मजबूत संबंध साझा किए हैं, जिसे वह आज भी अपना निकटतम पड़ोसी मानता है। वखान कॉरिडोर के साथ अफगानिस्ता भारत के साथ सीमा का एक छोटा सा हिस्सा साझा करता है, भले ही वह हिस्सा अब पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में पड़ता है, जिसे नई दिल्ली ने आधिकारिक तौर पर मान्यता नहीं दी है।

काबुल में नागरिक सरकार का समर्थक है भारत


भारत ने काबुल में राजा जहीर शाह से लेकर पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी तक सत्ता में आने वाली लगभग सभी सरकारों का समर्थन किया है। भारत ने काबुल में स्थापित तत्कालीन सोवियत समर्थित सरकार को भी मान्यता दी थी। नई दिल्ली ने हमेशा तटस्थ नीति का पालन किया है जब तक कि काबुल में सरकार वहां भारत के हितों के विरोध में नहीं है। जैसे-जैसे अफगानिस्तान के साथ संबंध मजबूत होते गए, भारत ने जलालाबाद, हेरात, कंधार और मजार-ए-शरीफ में वाणिज्य दूतावास खोले। पारस्परिक रूप से, अफगानिस्तान ने मुंबई और हैदराबाद में अपने वाणिज्य दूतावास खोले।


अन्य महत्वपुर्ण खबरें

 27 September 2026
न्यूयॉर्क: भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने शनिवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें सत्र को संबोधित करते हुए पाकिस्तान पर सीधा हमला बोला। जयशंकर ने शहबाज शरीफ…
 27 September 2026
काठमांडू: नेपाल के काठमांडू स्थित त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट से उड़ान भरने वाले भारतीय विमानों की सुरक्षा व्यवस्था पिछले 26 सालों से भारत खुद संभाव रहा है। नेपाल में इसको लेकर…
 27 September 2026
न्यूयॉर्क: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की दावेदारी को लेकर समर्थन लगातार बढ़ता जा रहा है। शनिवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन में बोलते हुए रूस के…
 27 September 2026
मॉस्को/अंकारा: रूस के विदेश मंत्री सर्गियो लावरोव ने कहा है कि तुर्की एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम बिना हमारी इजाजत के देश की सीमा से बाहर नहीं ले जा सकता। उन्होंने…
 27 September 2026
ढाका: तारिक रहमान के दिल्ली दौरे को लेकर बांग्लादेश लगातार भारत के सामने शर्त पर शर्त रख रहा है। शेख हसीना को वापस सौंपने की शर्त तो पहले से ही…
 27 September 2026
वॉशिंगटन/ढाका: शेख हसीना को लेकर भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव के बीच अमेरिका ने अहम बयान दिया है। अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारी ने गुरुवार को एक बयान…
 27 September 2026
मॉस्को: दुनिया भर में बढ़ते कूटनीतिक तनाव और तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाओं के बीच एक खौफनाक खुफिया रिपोर्ट ने पश्चिमी देशों की नींद उड़ा दी है। दावा किया जा…
 26 September 2026
न्यूयॉर्क: भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने शहबाज शरीफ के प्रोपेगैंडा को खारिज करते हुए करारा जवाब दिया है। भारत ने शहबाज शरीफ के भाषण के खिलाफ…
 26 September 2026
न्यूयॉर्क: संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर का मुद्दा उठाने वाले तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन को भारत ने करारा जवाब दिया है। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने…
Advt.