सरकार ने नहीं सुनी तो बेतवा बचाने खुद उतरे लोग:बारिश का पानी सहेजने 7 दिन में 55 छोटे चेक डैम बनाए, पौधरोपण के साथ सुरक्षा जिम्मा भी दिया

Updated on 30-06-2025 02:28 PM

करीब एक साल पहले सूख चुके बेतवा नदी के उद्गम स्थल को बचाने की कवायद रंग लाने लगी है। भोपाल, सीहोर, रायसेन, विदिशा सहित कई जिलों के पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने मई के अंतिम ​हफ्ते में झिरी गांव पहुंचकर महज सात दिन में 55 छोटे चेक डैम तैयार कर दिए। अब पौधरोपण हो रहा है।

रविवार को भी पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने ग्रामीणों के साथ 500 से ज्यादा फलदार पौधे लगाए। ग्रामीणों ने इनकी सुरक्षा का जिम्मा लिया है। दो हफ्ते पहले भी इसी समूह ने पौधरोपण किया था। इस पूरे अभियान का नेतृत्व रिटायर्ड आईआरएस अधिकारी और गांधीवादी विचारक डॉ. आरके पालीवाल कर रहे हैं।

उनके नेतृत्व में बेतवा अध्ययन एवं जनजागरण समूह ने तीन साल पहले उद्गम स्थल झिरी से कुरवाई तक यात्रा निकाली थी। इसमें देशभर के पर्यावरणविद शामिल हुए थे। इस दौरान मंडीदीप, भोजपुर और विदिशा का कचरा बेतवा में जाने से बिगड़ी हालत को सामने लाया गया।

इसकी रिपोर्ट भी सरकार को सौंपी गई, लेकिन ठोस कदम नहीं उठे। पिछले साल उद्गम स्थल सूख गया तो समूह ने तय किया कि जनता के सहयोग से इसे बचाएंगे। पालीवाल पहले आयकर विभाग भोपाल में डायरेक्टर (इंवेस्टिगेशन) रह चुके हैं।

आगे तीन मुख्य कामों पर होगा फोकस

1. उद्गम के चारों तरफ पेड़ों की कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध हो, जिससे वन क्षेत्र न सिकुड़े। 2. पहाड़ियों से बरसात का पानी सैकड़ों छोटे चैक डैम के माध्यम से जगह-जगह रोककर भू जल स्तर बढ़ाया जाए। 3. पानी की अधिक खपत वाली गेहूं और मूंग की फसलों की बजाय फलदार पौधों के बगीचे विकसित करेंगे, जिनसे भू-जल दोहन रुकेगा और जल संरक्षण होगा।

तपती गर्मी में हुई थी डैम बनाने की शुरुआत

पालीवाल के मुताबिक मई की कड़ी गर्मी में सामूहिक श्रमदान के जरिए चेक डैम बनाए गए। शुरुआत में मुश्किल लगा, लेकिन धीरे-धीरे भोपाल, विदिशा, इंदौर, हरदा, बैतूल, गंजबासौदा जैसे कई इलाकों से लोग जुड़ते गए। गांव के बच्चों ने भी श्रमदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। नतीजा यह रहा कि सात दिन में 55 चेक डैम बनकर तैयार हो गए। अब बरसात में पानी सहेजने के लिए इन चेक डैमों से जल स्तर बढ़ने की उम्मीद है।

हर परिवार को 10 पौधों का जिम्मा... 

इसके साथ ही पौधरोपण का काम भी तेज किया गया है। ग्रामीणों से पूछकर आम, अमरूद, नींबू और कटहल जैसे फलदार पौधे लगाए जा रहे हैं ताकि उनकी आमदनी भी बढ़े और वे इनकी देखरेख में दिलचस्पी लें। प्रति परिवार दस पौधे दिए जा रहे हैं, जिस पर करीब 1100 रुपए का खर्च आ रहा है, जिसे कार्यकर्ता खुद वहन कर रहे हैं।



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