फिजियोलॉजी और बायोकेमिस्ट्री में निजी प्रैक्टिस नहीं:प्रदेश के सरकारी व निजी मेडिकल कॉलेजों में पीजी की 50 से ज्यादा सीटें हो गईं लैप्स

Updated on 04-12-2022 06:36 PM

एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, बायो केमिस्ट्री जैसे मेडिकल के बेसिक सब्जेक्ट की पीजी सीटें इस बार फिर खाली रह गईं। सरकारी व निजी कॉलेजों में 50 से ज्यादा सीटें खाली रह गईं। यह इस सत्र के लिए लैप्स भी हो गई है। लैप्स होने वाली सीटाें में नॉन क्लीनिकल की 80 फीसदी व क्लीनिकल की 20 फीसदी सीटें शामिल हैं। विशेषज्ञों के अनुसार नॉन क्लीनिकल में प्राइवेट प्रैक्टिस का कोई स्कोप नहीं होता।

इन विषयों से एमडी बढ़े डॉक्टर केवल जनरल प्रैक्टिशनर की तरह इलाज कर सकते हैं। इसलिए एमबीबीएस के बाद डॉक्टर ऐसे विषयों में एडमिशन लेना ही नहीं चाहते। हां, जिन्हें टीचिंग का थोड़ा शौक हो, वे जरूर नॉन क्लीनिकल विषय में एडमिशन लेते हैं। मेडिकल कॉलेजों में पीजी कोर्स में एडमिशन 2 दिसंबर तक पूरा हुआ। तीन राउंड की काउंसिलिंग के बाद आखिरी चरण के लिए पीजी की कुल 96 सीटें खाली थीं।

रायपुर में पीएसएम की 3 समेत 13 सीटें खाली
नेहरू मेडिकल कॉलेज में पीएसएम की 3 समेत 13 सीटें खाली रह गईं। एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, बायो केमेस्ट्री व पैथोलॉजी की सीटें नहीं भर पाईं। यही नहीं कैंसर जैसे महत्वपूर्ण विषय की एक सीट पर आल इंडिया कोटे से कोई एडमिशन नहीं लिया। ईएनटी की एक सीट भी नहीं भरी। वहीं बिलासपुर में फोरेंसिक मेडिसिन व नॉन क्लीनिक की सीटें नहीं भर पाईं। यही स्थिति अंबिकापुर, राजनांदगांव व जगदलपुर में रही। निजी कॉलेजों में यही स्थिति रही।

निजी में हाल ही में बढ़ाई गई थी फीस
प्रदेश के एक निजी मेडिकल कॉलेज में पीजी की सीटों की फीस बढ़ाई गई है। हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया था। कोर्ट ने नॉन क्लीनिकल की फीस 10 लाख व क्लीनिकल विषयों की फीस 25 लाख सालाना की है। वहीं फीस विनियामक कमेटी इसके लिए 5 से साढ़े 8 लाख फीस तय की थी, लेकिन यह अंतरिम है।

निजी कॉलेज में रेडियो डायग्नोसिस जैसी महत्वपूर्ण सीटें पहले या दूसरे राउंड में ही भर जाती हैं, लेकिन इस बार खाली रह गई। जानकारों का कहना है कि पड़ोसी राज्यों की तुलना में यह फीस काफी ज्यादा है। इसलिए भी प्रदेश के मध्यम वर्ग से आने वाले छात्र एडमिशन से वंचित हो रहे हैं। टीचिंग में रुचि कम हो रही

डॉक्टरों की टीचिंग में रुचि पहले की तुलना में कम हो रही है, प्रैक्टिस पर ध्यान ज्यादा है। हालांकि सुपर स्पेश्यालिटी डिग्री वाले हिमेटेलॉजिस्ट डॉ. विकास गोयल व प्लास्टिक सर्जन डॉ. कमलेश अग्रवाल का कहना है कि टीचिंग में रुचि कम हुई हो, ऐसी बात नहीं है। हां, डॉक्टर ये ध्यान जरूर रखते हैं कि दूसरों की तुलना में वे कितने अच्छे डॉक्टर साबित हो सकते हैं। अब स्पेश्यालिटी नहीं, सुपर स्पेश्यालिटी का जमाना है। यही कारण है कि अब ज्यादातर डॉक्टर एमडी या एमएस के बाद डीएम या एमसीएच पर भी फोकस कर रहे हैं। मरीज भी ऐसे डॉक्टरों के पास इलाज कराना पसंद करते हैं।

"पिछले कुछ सालों से नॉन क्लीनिकल विषयों की सीटें खाली रह रही हैं। ऐसा ट्रेंड केवल प्रदेश में नहीं बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी है। हालांकि कहा जा सकता है कि जिन विषयों की मांग ज्यादा है, उनमें एडमिशन सबसे पहले हो रहा है।"

रायपुर में पीएसएम की 3 समेत 13 सीटें खाली
नेहरू मेडिकल कॉलेज में पीएसएम की 3 समेत 13 सीटें खाली रह गईं। एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, बायो केमेस्ट्री व पैथोलॉजी की सीटें नहीं भर पाईं। यही नहीं कैंसर जैसे महत्वपूर्ण विषय की एक सीट पर आल इंडिया कोटे से कोई एडमिशन नहीं लिया। ईएनटी की एक सीट भी नहीं भरी। वहीं बिलासपुर में फोरेंसिक मेडिसिन व नॉन क्लीनिक की सीटें नहीं भर पाईं। यही स्थिति अंबिकापुर, राजनांदगांव व जगदलपुर में रही। निजी कॉलेजों में यही स्थिति रही।

निजी में हाल ही में बढ़ाई गई थी फीस
प्रदेश के एक निजी मेडिकल कॉलेज में पीजी की सीटों की फीस बढ़ाई गई है। हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया था। कोर्ट ने नॉन क्लीनिकल की फीस 10 लाख व क्लीनिकल विषयों की फीस 25 लाख सालाना की है। वहीं फीस विनियामक कमेटी इसके लिए 5 से साढ़े 8 लाख फीस तय की थी, लेकिन यह अंतरिम है।

निजी कॉलेज में रेडियो डायग्नोसिस जैसी महत्वपूर्ण सीटें पहले या दूसरे राउंड में ही भर जाती हैं, लेकिन इस बार खाली रह गई। जानकारों का कहना है कि पड़ोसी राज्यों की तुलना में यह फीस काफी ज्यादा है। इसलिए भी प्रदेश के मध्यम वर्ग से आने वाले छात्र एडमिशन से वंचित हो रहे हैं। टीचिंग में रुचि कम हो रही

डॉक्टरों की टीचिंग में रुचि पहले की तुलना में कम हो रही है, प्रैक्टिस पर ध्यान ज्यादा है। हालांकि सुपर स्पेश्यालिटी डिग्री वाले हिमेटेलॉजिस्ट डॉ. विकास गोयल व प्लास्टिक सर्जन डॉ. कमलेश अग्रवाल का कहना है कि टीचिंग में रुचि कम हुई हो, ऐसी बात नहीं है। हां, डॉक्टर ये ध्यान जरूर रखते हैं कि दूसरों की तुलना में वे कितने अच्छे डॉक्टर साबित हो सकते हैं। अब स्पेश्यालिटी नहीं, सुपर स्पेश्यालिटी का जमाना है। यही कारण है कि अब ज्यादातर डॉक्टर एमडी या एमएस के बाद डीएम या एमसीएच पर भी फोकस कर रहे हैं। मरीज भी ऐसे डॉक्टरों के पास इलाज कराना पसंद करते हैं।



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