रिश्वतखोर अफसरों की आ गई शामत! सुप्रीम कोर्ट की दो टूक- मुकदमा चलाने के लिए अनुमति की जरूरत नहीं
Updated on
18-10-2026 11:32 AM
नई दिल्ली: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई लोक सेवक रिश्वत मांगते हुए पकड़ा जाता है, तो उसे बड़े अधिकारियों से पूर्व अनुमति (सेंक्शन) लेने का सुरक्षा कवच नहीं मिलेगा। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि यह कानूनी सुरक्षा केवल इसलिए दी गई है, ताकि अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए लिए गए फैसलों के लिए बेवजह परेशान न किए जाएं।क्या कहता है पुराना नियम
यह फैसला जस्टिस एसवीएन भट्टी और एनवी अंजारिया की पीठ ने अधिनियम की धारा 17A की व्याख्या करते हुए किया। इस धारा को 2018 में कानून में जोड़ा गया था। नियम के मुताबिक सरकारी कर्मचारियों से बिना आधिकारिक मंजूरी के पूछताछ या जांच नहीं की जा सकती।रिश्वत मांगने का आरोप
राजस्थान पुलिस के एक कांस्टेबल ने अपने खिलाफ दर्ज FIR और चार्जशीट को चुनौती देते हुए एक अपील दायर की थी, जिसमें उस पर 1.5 लाख रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप है। इस अपील को खारिज करते हुए बेंच ने कहा कि धारा 17A का सुरक्षा कवच, आपराधिक मामलों का सामना कर रहे सभी लोक सेवकों पर एक साथ या बिना किसी भेदभाव के लागू नहीं किया जा सकता।
फैसले से संबंध नहीं
राजस्थान की अतिरिक्त महाधिवक्ता संस्कृति पाठक की दलीलों को स्वीकार करते हुए, पीठ ने कहा कि रिश्वत की मांग करना पूरी तरह से एक आपराधिक कृत्य है। इसका आधिकारिक कार्यों से कोई लेना-देना नहीं है, और न ही इसका लोक सेवक के रूप में अपीलकर्ता द्वारा दी गई किसी सिफारिश या लिए गए किसी निर्णय से कोई संबंध है।
अपील पर क्या बोला कोर्ट
फैसला लिखते हुए जस्टिस अंजारिया ने कहा कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, अपीलकर्ता का कृत्य इस अधिनियम की धारा 17A के तहत मिलने वाले संरक्षण के दायरे में नहीं आता है। यह नहीं कहा जा सकता कि मंजूरी न होने के कारण पूरी कार्यवाही दूषित हो गई थी।